हिन्दी निबंध लेखन | Nibandh Lekhan Format

निबन्ध लेखन 

निबन्ध का अर्थ है – अच्छी तरह बंधा हुआ। इसमें लेखक अपने भावों और विचारों को अच्छी तरह बाँधकर यानी सुसंगत और सुगठित रूप से अपनी भाषा शैली में प्रस्तुत करता है। इसमें उसे अपनी बात खुलकर कहने की छूट रहती है। निबंध विषय और स्तर के अनुसार छोटा या बड़ा हो सकता है, किन्तु अपने आप में पूर्ण होता है। 

निबंध की भाषा विषय के अनुकूल और व्याकरण सम्मत होनी चाहिए । वाक्य संक्षिप्त, सरल और बोधगम्य होने चाहिए। 

स्तर की दृष्टि से निबंध दो प्रकार के होते हैं- 

(1) वस्तुपरक, 

(ii) वैयक्तिक या आत्मपरक । 

‘वस्तुपरक निबंध’ में लेखक अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ता बिना पूर्वाग्रह या पक्षपात से जैसा देखता है वैसा ही घटना या दृश्य का वर्णन करता है। ‘

वैयक्तिक निबंध’ में लेखक के व्यक्तित्व की छाप रहती है। वह अपने ढंग से विषय की समीक्षा करता है। वह विषय के अच्छे गुणों को उभारकर रख सकता है या कमियों को खोलकर सामने ला सकता है। वह विषय की प्रशंसा करके उसकी महत्ता बढ़ा भी सकता है। ऐसे निबंध साहित्यिक कोटि में आते हैं और उच्चस्तर के माने जाते हैं।

शैली की दृष्टि से निबंध चार प्रकार के होते हैं- 

(i) वर्णनात्मक 

(i) विवरणात्मक 

(ii) विचारात्मक 

(iv) भावात्मक । 

‘वर्णनात्मक निबंध’ में देखे-सुने गए स्थानों, त्यौहारों, वस्तुओं, या प्राकृतिक दृश्यों आदि का वर्णन होता है। ‘विवरणात्मक निबंध’ में घटनाओं’ या व्यक्ति के जीवन का क्रमबद्ध विवरण दिया जाता है। ‘विचारात्मक निबंध’ में विचार या चिन्तन की प्रधानता रहती है ।

इसमें लेखक किसी समस्या पर तर्क सहित अपनी सहमति या असहमति प्रकट करता है । इसमें लेखक अपनी विश्लेषण क्षमता, बुद्धिमत्ता का परिचय देता है। निबंध की भाषा गंभीर होती है और विचारों की तर्कसंगत पुष्टि की जाती है। ‘भावात्मक निबंध में भावों की प्रधानता रहती है। इसमें लेखक की आत्मीयता झलकती है। वह पाठक के हृदय को प्रभावित करने का प्रयास करता है। वह अपनी कल्पना और अनुभूति के आधार पर विषय के प्रति अपना दृष्टिकोण रखता है।

 निबंध में मुख्यतः तीन भाग होते हैं- 

(i) प्रस्तावना 

(ii) विषय प्रतिपादन 

(ii) उपसंहार 

(i) प्रस्तावना : प्रस्तावना या भूमिका में विषय का सामान्य परिचय दिया जाता है। घर के द्वार से या शरीर के सिर से इसकी तुलना की जा सकती है। प्रस्तावना का आरंभ रोचक प्रभावशाली संक्षिप्त और प्रासंगिक होना चाहिए । 

किसी कविता की पंक्ति, कहावत या महान लेखक के दृष्टांत से निबंध प्रारंभ किया जा सकता है। इनमें विषय का अर्थ, उसकी परिभाषा और महत्व बताया जाता है । 

(ii) विषय प्रतिपादन : विषय प्रतिपादन के सोपान पर विचारों को विभिन्न इकाइयों में विभाजित करके क्रमबद्ध रूप से और तर्कपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। प्रतिपादित विषय को पुष्ट और प्रमाणित करने के लिए प्रसंगानुकूल विभिन्न उद्धरणों, तर्कों और प्रमाणों का उल्लेख किया जाता है। प्रत्येक इकाई को अलग अलग अनुच्छेदों में रखा जाता है। विचारों का पल्लवन संतुलित रूप से किया जाना चाहिए। उसमें अनावश्यक विस्तार या तथ्यों की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए । 

(ii) उपसंहार : यह निबंध का अंतिम सोपान है। इसमें लेखक सारे विचार विमर्श के उपरांत ऐसे निष्कर्ष पर पहुँचता है, जो पाठक को संतोषजनक लगे । एक अच्छा निबंध पाठक पर स्थायी प्रभाव छोड़ जाता है। 

निबंध लेखन एक कला है। इसके लिए सोचने-समझने वाली बुद्धि, निरीक्षण करने वाली पैनी दृष्टि और अनुभव करने वाले हृदय की आवश्यकता होती है। इसलिए विद्यार्थियों को बड़े मनोयोगपूर्वक निबंधलेखन का अभ्यास करना चाहिए ।

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